परंपराएं समय के साथ बदलती हैं, लेकिन कुछ परंपराएं ऐसी भी होती हैं, जो सदियों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा क्षेत्र स्थित सोनामगर गांव में दशहरा मनाने की ऐसी ही अनोखी परंपरा आज भी कायम है। यहां बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व विजयादशमी के दिन नहीं, बल्कि एकादशी को मनाया जाता है।

इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि यहां रावण के पुतले का दहन नहीं होता, बल्कि सहस्त्रबाहु रावण की नग्न प्रतिमा बनाकर विधि-विधान से उसका वध किया जाता है। पुजारी द्वारा प्रतिमा पर खड्ग से प्रहार किए जाने के बाद श्रद्धालु उसकी मिट्टी अपने घर ले जाते हैं और एक-दूसरे को तिलक लगाकर उत्सव मनाते हैं। आस्था, परंपरा और लोकविश्वास से जुड़ा यह अनूठा दशहरा देखने के लिए हर साल दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग सोनामगर पहुंचते हैं।

वीओ-1: पीढ़ियों से चली आ रही अनूठी परंपरा
धमतरी जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर सिहावा क्षेत्र के सोनामगर गांव में दशहरे का नजारा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग होता है। सुबह से ही गांव में लोगों की भीड़ जुटने लगती है। हर कोई इस अनोखी परंपरा को करीब से देखने और इसका साक्षी बनने के लिए उत्सुक रहता है। यहां दशहरा एकादशी के दिन मनाया जाता है और बुराई के प्रतीक के रूप में सहस्त्रबाहु रावण की प्रतिमा तैयार की जाती है। गांव के लोग पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

वीओ-2: मिट्टी की प्रतिमा का खड्ग से किया जाता है वध
इस विशेष आयोजन की तैयारियां अलसुबह से ही शुरू हो जाती हैं। प्रतिमा निर्माण के लिए गांव के घर-घर से मिट्टी एकत्र की जाती है। इसके बाद गांव के पारंपरिक मूर्तिकार द्वारा सहस्त्रबाहु रावण की प्रतिमा तैयार की जाती है। मान्यता के अनुसार, वासना से ग्रसित इस असुर का वध माता चंडिका ने अपने खड्ग से किया था। इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी परंपरा के तहत मंदिर के पुजारी मंत्रोच्चार के बाद खड्ग से प्रतिमा का वध करते हैं। इसके बाद श्रद्धालु प्रतिमा की मिट्टी लेने के लिए उमड़ पड़ते हैं। मान्यता है कि इस मिट्टी को घर ले जाना और तिलक लगाना आस्था तथा परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वीओ-3: शीतला माता की पूजा और चांदमारी की रस्म
सोनामगर के दशहरे में रावण वध से पहले भी कई पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं। गांव के बाहर शीतला माता की पूजा-अर्चना और चांदमारी की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद शाम ढलने पर पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आगे बढ़ते हैं। रावण वध के बाद माता को शांत करने के लिए कुष्मांडा की बलि दी जाती है। इसके पश्चात माता के अस्त्र को उनके चरणों में अर्पित किया जाता है और देवी-देवताओं को श्रीफल भेंट कर विदाई दी जाती है। इन सभी रस्मों के पीछे स्थानीय धार्मिक मान्यताएं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं जुड़ी हुई हैं।
वीओ-4: परंपरा में महिलाओं की भागीदारी नहीं
सोनामगर के दशहरे की एक और विशेषता यह है कि इस पारंपरिक आयोजन में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती। गांव के पुजारी, मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी, मूर्तिकार और स्थानीय लोग मिलकर इस आयोजन को संपन्न कराते हैं। परंपरा से जुड़े लोगों का कहना है कि यह आयोजन गांव की विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यही वजह है कि समय बदलने के बावजूद सोनामगर का दशहरा अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
बाइट्स:
- ज्ञान सागर — पुजारी
- तुकाराम — सदस्य
- नरेंद्र नाग — अध्यक्ष, मंदिर ट्रस्ट
- चक्रधर बाग — थानेदार
- मनोज कुमार चक्रधारी — मूर्तिकार
- भरत निर्मलकर — दर्शक
- नारद निषाद — दर्शक
एंकर आउट्रो:
सोनामगर का दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की अनूठी झलक भी है। सहस्त्रबाहु रावण की प्रतिमा का वध, उसकी मिट्टी को घर ले जाने की मान्यता और विशेष पूजा-पद्धति इस गांव को अलग पहचान देती है। आधुनिकता के दौर में भी इस परंपरा का कायम रहना बताता है कि लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत आज भी ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।